Tuesday, March 13, 2018

Hindu Nav Varsh 2075




होली के पश्चात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बंसतोत्सव के रूप में नववर्ष के महोत्सव का आरंभ हो जाता है।
हिन्दू पंचांग के बारह महीनों के क्रम में पहले चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्षभर की सभी तिथियों में इसलिए सबसे अधिकमहत्व रखती है क्योंकि मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की। 

इस तिथि को प्रथम स्थान मिला, इसलिए इसे प्रतिपदा कहा गया है। 

जब ब्रह्मा ने सृष्टि का प्रारंभ किया उस समय इसे प्रवरा तिथि सूचित किया था, जिसका अर्थ है सर्वोत्तम। 
इस अर्थ में यह वर्ष का सर्वोत्तम दिन है जो सिखाता है कि हम अपने जीवन में सभी कामों में, सभी क्षेत्रों में जो भी कर्म करें, उनमें हमारा स्थान और हमारे कर्म लोक कल्याण की दृष्टि से श्रेष्ठ स्थान पर रखे जाने योग्य हों। 

इसे संवत्सर प्रतिपदा भी कहते हैं। सिंधी समाज का पर्व चेटीचंड भी वर्ष प्रतिपदा के अगले दिन शुरू होता है। शुक्ल पक्ष में चांद अपने पूरे सौन्दर्य के साथ आकाश में विराजमान होता है। इसलिए चैत्रचंद्र का देशज रूप हुआ चैतीचांद और फिर सिंधी में हुआ चेटीचंड। 
महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पाड़वा ( गुढी पाड़वा) के नाम से मनाया जाता है। 

वैसे नवसंवत्सर के लिए गुड़ी पड़वा अब समूचे देश में सामान्य तौर पर जाना जाने लगा है। 

महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है।

Thursday, March 8, 2018

Pithampur ki Gatha -Baba Kaleshwarnath ki Mahima



जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर जिला मुख्यालय से 11 कि. मी. और दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के चांपा जंक्शन से मात्र 8 कि. मी. की दूरी पर हसदेव नदी के दक्षिणी तट पर पीथमपुर में कालेश्वरनाथ का एक मंदिर है। जांजगीर के कवि श्री तुलाराम गोपाल ने ``िशवरीनारायण और सात देवालय`` में पीथमपुर को पौराणिक नगर माना है। प्रचलित किंवदंति को आधार मानकर उन्होंने लिखा है कि पौराणिक काल में धर्म वंश के राजा अंगराज के दुराचारी पुत्र राजा बेन प्रजा के उग्र संघर्ष में भागते हुए यहां आये और अंत में मारे गए। चूंकि राजा अंगराज बहुत ही सहिष्णु, दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति के थे अत: उनके पवित्र वंश की रक्षा करने के लिए उनके दुराचारी पुत्र राजा बेन के मृत शरीर की ऋषि-मुनियों ने इसी स्थान पर मंथन किया। पहले उसकी जांघ से कुरूप बौने पुरूष का जन्म हुआ। बाद में भुजाओं के मंथन से नर-नारी का एक जोड़ा निकला जिन्हें पृथु और अर्चि नाम दिया गया। ऋषि-मुनियों ने पृथु और अर्चि को पति-पत्नी के रूप में मान्यता देकर विदा किया। इधर बौने कुरूप पुरूष महादेव की तपस्या करने लगा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग की स्थापना और पूजा-अर्चना का विधान बताकर अंतध्र्यान हो गये। बौने कुरूप पुरूष ने जिस कालेश्वर पार्थिव लिग की स्थापना कर पूजा-अर्चना करके मुक्ति पायी थी वह काल के गर्त में समाकर अदृश्य हो गया था। वही कालान्तर में हीरासाय तेली को दर्शन देकर उन्हें न केवल पेट रोग से मुक्त किया बल्कि उसके वंशबेल को भी बढ़ाया। श्री तुलसीराम पटेल द्वारा सन 1954 में प्रकािशत श्री कलेश्वर महात्म्य में हीरासाय के वंश का वर्णन हैं-
तेहिके पुत्र पांच हो भयऊ। िशव सेवा में मन चित दियेऊ।। प्रथम पुत्र टिकाराम पाये। बोधसाय भागवत, सखाराम अरु बुद्धू कहाये।। सो िशवसेवा में अति मन दिन्हा। यात्रीगण को िशक्षा दिन्हा।। यही विघि िशक्षा देते आवत। सकल वंश िशवभक्त कहावत।।
कहना न होगा हीरासाय का पूरा वंश िशवभक्त हुआ और मंदिर में प्रथम पूजा का अधिकार पाया। श्री प्यारेलाल गुप्त ने भी `प्राचीन छत्तीसगढ़` में हीरासाय को पीथमपुर के िशव मंदिर में पूजा-अर्चना कर पेट रोग से मुक्त होना बताया हैं। उन्होंंने खरियार (उड़ीसा) के राजा को भी पेट रोग से मुक्त करने के लिए पीथमपुर यात्रा करना बताया हैं। बिलासपर वैभव और बिलासपुर जिला गजेटियर में भी इसका उल्लेख हैं। लेकिन जनश्रुति यह है कि पीथमपुर के कालेश्वरनाथ (अपभ्रंश कलेश्वरनाथ) की फाल्गुन पूर्णिमा को पूजा-अर्चना और अभिषेक करने से वंश की अवश्य वृि़द्ध होती है। खरियार (उड़ीसा) के जिस जमींदार को पेट रोग से मुक्ति पाने के लिए पीथमपुर की यात्रा करना बताया गया है वे वास्तव में अपने वंश की वृिद्ध के लिए यहां आये थे। खरियार के युवराज और उड़ीसा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ॰ जे. पी. सिंहदेव ने मुझे बताया कि उनके दादा राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने अपने वंश की वृिद्ध के लिए पीथमपुर गए थे। समय आने पर कालेश्वरनाथ की कृपा से उनके दो पुत्र क्रमश: आरतातनदेव और विजयभैरवदेव तथा दो पुत्री कनक मंजरी देवी और शोभज्ञा मंजरी देवी का जन्म हुआ। वंश वृिद्ध होने पर उन्होंने पीथमपुर में एक मंदिर का निर्माण कराया लेकिन मंदिर में मूर्ति की स्थापना के पूर्व 36 वर्ष की अल्पायु में सन् 1912 में उनका स्वर्गवास हो गया। बाद में मंदिर ट्रस्ट द्वारा उस मंदिर में गौरी (पार्वती) जी की मूर्ति स्थापित करायी गयी।
यहां एक किंवदंति और प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार नागा साधु के आशीर्वाद से कुलीन परिवार की एक पुत्रवधू को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इस घटना को जानकर अगले वर्ष अनेक महिलाएं पुत्ररत्न की लालसा लिए यहां आई जिससे नागा साधुओं को बहुत परेशानी हुई और उनकी संख्या धीरे धीरे कम होने लगी। कदाचित् इसी कारण नागा साधुओं की संख्या कम हो गयी है। लेकिन यह सत्य है कि आज भी अनेक दंपत्ति पुत्र कामना लिए यहां आती हैं और मनोकामना पूरी होने पर अगले वर्ष जमीन पर लोट मारते दर्शन करने यहां जाते हैं। पीथमपुर के काल कालेश्वरनाथ की लीला अपरम्पार है। छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु कालीन कवि श्री वरणत सिंह चौहान ने `िशवरीनारायण महात्म्य और पंचकोसी यात्रा` नामक पुस्तक में पीथमपुर की महत्ता का बखान किया है :-
हसदो नदी के तीर में, कलेश्वरनाथ भगवान। दर्शन तिनको जो करे, पावही पद निर्वाण।। फाल्गुन मास की पूर्णिमा, होवत तहं स्नान। काशी समान फल पावही, गावत वेद पुराण।। बारह मास के पूर्णिमा, जो कोई कर स्नान। सो जैईहैं बैकुंठ को, कहे वरणत सिंह चौहान।।
पीथमपुर के कालेश्वरनाथ मंदिर की दीवार में लगे िशलालेख के अनुसार श्री जगमाल गांगजी ठेकेदार कच्छ कुम्भारीआ ने इस मंदिर का निर्माण कार्तिक सुदि 2, संवत् 1755 (सन् 1698) को गोकुल धनजी मिस्त्री से कराया था। चांपा के पडित छविनाथ द्विवेदी ने सन् 1897 में संस्कृत में ``कलिश्वर महात्म्य स्त्रोत्रम`` लिखकर प्रकािशत कराया था। इस ग्रंथ में उन्होंने कालेश्वरनाथ का उद्भव चैत्र कृष्ण प्रतिपदा संवत् 1940 (अर्थात सन् 1883 ई.) को होना बताया है। मंदिर निर्माण संवत् 1949 (सन् 1892) में शुरू होकर संवत् 1953 (सन् 1896) में पूरा होने, इसी वर्ष मूर्ति की प्रतिष्ठा हीरासाय तेली के हाथों कराये जाने तथा मेला लगने का उल्लेख है। इसी प्रकार पीथमपुर मठ के महंत स्वामी दयानंद भारती ने भी संस्कृत में ``पीथमपुर के श्री शंकर माहात्म्य`` लिखकर सन् 1953 में प्रकािशत कराया था। 36 “लोक में उन्होंने पीथमपुर के िशवजी को काल कालेश्वर महादेव, पीथमपुर में चांपा के सनातन धर्म संस्कृत पाठशला की शाखा खोले जाने, सन् 1953 में ही तिलभांडेश्वर, काशी से चांदी के पंचमुखी िशवजी की मूर्ति बनवाकर लाने और उसी वर्ष से पीथमपुर के मेले में िशवजी की शोभायात्रा निकलने की बातों का उल्लेख किया है। उन्होंने पीथमपुर में मंदिर की व्यवस्था के लिए एक मठ की स्थापना तथा उसके 50 वर्षों में दस महंतों के नामों का उल्लेख इस माहात्म्य में किया है। इस माहात्म्य को लिखने की प्रेरणा उन्हें पंडित िशवशंकर रचित और सन् 1914 में जबलपुर से प्रकािशत ``पीथमपुर माहात्म्य`` को पढ़कर मिली। जन आकांक्षाओं के अनुरूप उन्होंने महात्म्य को संस्कृत में लिखा। इसके 19 वें “लोक में उन्होंने लिखा है कि वि. सं. 1945, फाल्गुन पूर्णमासी याने होली के दिन से इस शंकर देव स्थान पीथमपुर की ख्याति हुई। इसी प्रकार श्री तुलसीराम पटेल ने पीथमपुर : श्री कलेश्वर महात्म्य में लिखा है कि तीर्थ पुरोहित पंडित काशीप्रसाद पाठक पीथमपुर निवासी के प्रपिता पंडित रामनारायण पाठक ने संवत् 1945 को हीरासाय तेली को िशवलिंग स्थापित कराया था।
तथ्य चाहे जो भी हो, मंदिर अति प्राचीन है और यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं है कि जब श्री जगमाल गांगजी ठेकेदार ने संवत् 1755 में मंदिर निर्माण कराया है तो अवश्य मूर्ति की स्थापना उसके पूर्व हो चुकी होगी। ...और किसी मंदिर को ध्वस्त होने के लिए 185 वर्ष का अंतराल पर्याप्त होता है। अत: यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं है कि 185 वर्ष बाद उसका पुन: उद्भव संवत् 1940 में हुआ हो और मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसमें मंदिर के पूर्व में निर्माण कराने वाले िशलालेख को पुन: दीवार में जड़ दिया गया होगा।
पीथमपुर में काल कालेश्वरनाथ मंदिर के निर्माण के साथ ही मेला लगना शुरू हो गया था। प्रारम्भ में यहां का मेला फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र पंचमी तक ही लगता था, आगे चलकर मेले का विस्तार हुआ और इंपीरियल गजेटियर के अनुसार 10 दिन तक मेला लगने लगा। इस मेले में नागा साधु इलाहाबाद, बनारस, हरिद्वार, ऋषिकेष, नासिक, उज्जैन, अमरकंटक और नेपाल आदि अनेक स्थानों से आने लगे। उनकी उपस्थिति मेले को जीवंत बना देती थी। मेले में पंचमी के दिन काल कालेश्वर महादेव के बारात की शोभायात्रा निकाली जाती थी। कदाचित् िशव बारात के इस शोभायात्रा को देखकर ही तुलसी के जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास ने उिड़या में िशवायन लिखा। िशवायन के अंत में छत्तीसगढ़ी में िशव बारात की कल्पना को साकार किया है।
इसी प्रकार पीथमपुर का मठ खरौद के समान शैव मठ था। खरौद के मठ के महंत गिरि गोस्वामी थे, उसी प्रकार पीथमपुर के इस शैव मठ के महंत भी गिरि गोस्वामी थे। पीथमपुर के आसपास खोखरा और धारािशव आदि गांवों में गिरि गोस्वामियों का निवास था। खोखरा में गिरि गोस्वामी के िशव मंदिर के अवशेष हैं और धारािशव उनकी मालगुजारी गांव है। इस मठ के पहले महंत श्री शंकर गिरि जी महाराज थे जो चार वर्ष तक इस मठ के महंत थे। उसके बाद श्री पुरूषोत्तम गिरि जी महाराज, श्री सोमवारपुरी जी महाराज, श्री लहरपुरी जी महाराज, श्री काशीपुरी जी महाराज, श्री िशवनारायण गिरि जी महाराज, श्री प्रागपुरि जी महाराज, स्वामी गिरिजानन्द जी महाराज, स्वामी वासुदेवानन्द जी महाराज और स्वामी दयानन्द जी महाराज इस मठ के महंत हुए। मठ के महंत तिलभांडेश्वर मठ काशी से संबंधित थे। स्वामी दयानन्द भारतीे जी को पीथमपुर मठ की व्यवस्था के लिए तिलभांडेश्वर मठ काशी के महंत स्वामी अच्युतानन्द जी महाराज ने 20.02.1953 को भेजा था। स्वामी गिरिजानन्दजी महाराज पीथमपुर मठ के आठवें महंत हुए। उन्होंने ही चांपा को मुख्यालय बनाकर चांपा में एक `सनातन धर्म संस्कृत पाठशाला` की स्थापना सन् 1923 में की थी। इस संस्कृत पाठशाला से अनेक विद्यार्थी पढ़कर उच्च िशक्षा के लिए काशी गये थे। आगे चलकर पीथमपुर में भी इस संस्कृत पाठशाला की एक शाखा खोली गयी थी। हांलाकि पीथमपुर में संस्कृत पाठशाला अधिक वर्षों तक नहीं चल सकी (लेकिन उस काल में संस्कृत में बोलना, लिखना और पढ़ना गर्व की बात थी। उस समय रायगढ़ और िशवरीनारायण में भी संस्कृत पाठशाला थी। अफरीद के पंडित देवीधर दीवान ने संस्कृत भाषा में विशेष रूचि होने के कारण अफरीद में एक संस्कृत ग्रंथालय की स्थापना की थी। आज इस ग्रंथालय में संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह है जिसके संरक्षण की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि यहां के दीवान परिवार का पीथमपुर से गहरा संबंध रहा है।
सम्प्रति पीथमपुर का मंदिर अच्छी स्थिति में है। समय समय पर चांपा जमींदार द्वारा निर्माण कार्य कराये जाने का उल्लेख िशलालेख में है। रानी साहिबा उपमान कुंवरि द्वारा फर्श में संगमरमर लगवाया गया है। पीथमपुर के आसपास के लोगों द्वारा और क्षेत्रीय समाजों के द्वारा अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया है।[1]

Wednesday, March 7, 2018

Kanger Valley national Park - Baster





प्रकृति ने कांगेर घाटी को एसा उपहार सौंपा है, जहाँ वन देवी अपने पूरे श्रृंगार मे मंत्रमुग्ध कर देने वाली दृश्यावलियों को समेटे, भूमिगार्भित गुफाओ को सीने से लगाकर यूं खडी होती है मानो आपके आगमन का इंतजार कर रही हो। कांगेर घाटी का दर्शन एक संतोषप्रद अवर्णनीय एवं बेजोड प्राकृतिक अनुभव का उदाहरण है।



स्थिति एवं दूरी


कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ के जगदलपुर जिला से मात्र २७ किमी की दूरी पर स्थित है। रायपुर जिला से लगभग ३३० किमी की दूरी पर है। यह उत्तर पश्चिम किनारे पर तीरथगढ जलप्रपात से प्रारंभ होकर पूर्व मे उडिसा की सीमा कोलाब नदी तक फैला है। कांगेर नदी इसके बीचो-बीच इठलाती हुई चलती है। इसकी औसत चौडाई ६ किमी एवं लम्बाई ४८ किमी है। इसका क्षेत्रफल २०० वर्ग किमी है। इसकी सीमा ४८ गाँवों से घिरी है।
जीवमंडल रिजर्व


बस्तर मे प्रकृति के इस उपहार को संरक्षण के लिये आरक्षित अनोखे वन को जुलाई १९८२ मे कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। इसके अनछुये एवं कुंवारे वनो के सौंदर्य को देखकर इसे जीवमंडल (बायोस्फियर) रिजर्व भी घोषित किया गया है। आरक्षित वन घोषित करने का उद्देश्य जंगल एवं इसके प्राकृतिक मृतप्राय घटको को पुनर्जीवित कर हर हालत मे इसे सुरक्षा प्रदान कर, वन्य प्राणियों के लिये उपयुक्त शरण स्थल प्रदान करना था एवं प्रकृति प्रेमियों एवं पर्यटको के लिये एक आकर्षक का केन्द्र बनाना था।
वन प्रजाति


इस राष्ट्रीय उद्यान मे कई प्रकार की वन प्रजातियां मिलती है। जिससे यहां के वनो की विविधिता बढती है। इनमें दक्षिणी पेनिनसुलर मिक्स्ड डेसिहुअस बन, आर्ड सागौन, वन-इनमे साल, बीजा, साजा, हल्दु, चार, तेंदु कोसम, बेंत, बांस एवं कई प्रकार के वनौषधि पौधे मिलते है।
पक्षियों का कलरव


पक्षियों का चहचहाना सुनना है तो कांगेर घाटी मे आपका स्वागत है। यहां वन्य प्राणियों के साथ साथ कई रंग-बिरंगी चिडियाअं उडते हुये दिख जाती है।छत्तीसगढ का राज्य पक्षी पहाडी मैना इन्ही जंगलो मे निवास करती है। इनमे पहाडी मैना के साथ भृगराज, उल्लू, वनमुर्गी, जंगल मुर्गा, क्रेस्टेड, सरपेंट इगल, श्यामा रैकेट टेल, ड्रांगो आदि सामान्यत: पाये जाते है।
आवास व्यव्स्था


आवास के लिये उद्यान मे कई वन विश्राम गृह है जिनमे कोटमसर, नेतानार, तीरथ्गढ, दरभा और जगदलपुर मे है। जिनका आरक्षण संचालक, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जगदलपुर से कराया जाता है।
आवागमन


कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान पहुचने मे वायु मार्ग के लिये निकटतम हवाई अड्डा रायपुर है जो देश के प्रमुख नगरो से जुडा है। रेलमार्ग मे विशाखापटनम-किरंदुल रेलमार्ग पर निकटतम रेल्वे स्टेशन जगदलपुर है। दिल्ली-मुंबई हावडा रेलमार्ग पर निकटतम रेल्वे स्टेशन रायपुर है। सडक मार्ग मे रायपुर-जगदलपुर ३०३ किमी है। विशाखापटनम-जगदलपुर ३१३ किमी है। हैदराबाद-जगदलपुर ५६५ किमी है।
मौसम एवं तापमान


वर्ष भर यहां का मौसम भ्रमण के लिये अनुकुल है। शीत ऋतु मे अधिकतम तापमान ३० सेन्टीग्रेड व न्युनतम १३ सेन्टीग्रेड रहता है। ग्रीष्म मे अधिकतम ४२सेन्टीग्रेड व न्युनतम २० सेन्टीग्रेड रहता है। यहां औसत वर्षा १५२ सेमी होती है।
महत्वपूर्ण जानकारी


उद्यान १ नवम्बर से ३० जून तक खुला रहता है। वर्षाकाल मे जुलाई से अक्टूबर तक उद्यान बंद रहता है। पक्षियों को निहारने के लिये बायनाकुलर ले जाना न भुले व कैमरा भी ले जाना न भुले। वन्य प्राणी प्रात: व शाम को विचरण के लिये निकलते है। दुर्लभ प्राणी कई बार कई कई दिनो मे दिखते है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान मे वो सभी चीजे है जो किसी राष्ट्रीय उद्यान की विशेषता होती है। यहां वनाच्छादित धरा के साथ वन्य प्राणियोंके अतिरिक्त कल-कल करते प्रपात व इठलाती कांगेर नदी भी है। यहां की निरवता एक अलग वातावरण बनाती है। प्रकृति प्रेमियों के लिये यह स्वर्ग है। यहां पर रोमांचक खेलों जैसे ट्रेकिन्ग, मेचर ट्रेल पर विचरण, रैपलिंग आदि की असीम संभावना है।

Monday, March 5, 2018

Niagra Falls Of India - Chitrakoot


छत्तीसगढ़ बनने के बाद पहले गुमनाम रहे बस्तर में भी पर्यटकों की बड़ी संख्या यहां के प्रपातों, गुफाओं, राष्ट्रीय उद्यानों व यहां की निराली दुनिया को देखने आने लगी है। बहुत ही कम लोगों को यह जानकारी है कि बस्तर में ही भारत के विशालतम जलप्रपात के अतिरिक्त अन्य दर्शनीय जलप्रपात हैं। बस्तर आने के लिए पहले जगदलपुर आना होता है जो कि बस्तर का प्रमुख नगर है। उत्तर से यदि आप आ रहे हैं तो राजधानी रायपुर तक रेल से व उसके बाद सड़क मार्ग से जगदलपुर की दूरी 275 किमी. और यदि आप दक्षिण से आ रहे हों तो बरास्ता विशाखापट्टनम से रेल से जगदलपुर 320 किमी. दूर है। हालांकि इस सफर में लगते हैं पूरे 10 घंटे, किंतु इस मार्ग से यदि आप गुजरते हैं तो आपको आन्ध्र व उड़ीसा की पहाडि़यों के सौंदर्य को देखने का एक अद्भुत अनुभव होता है तो इस अनूठे रेल मार्ग की विविधता एक रोमांच पैदा करती है। बस्तर के जलप्रपातों को देखने का यदि सबसे अच्छा समय यदि माना जाए तो वह है अक्टूबर से फरवरी के मध्य का। अक्टूबर के आते-जाते बस्तर में मौसम सुहावना होने लगता है।
कई रंग है
चित्रकोट के गोदावरी की सहायक नदी इंद्रावती पर चित्रकोट नामक स्थान पर यह प्रपात भारत का विशालतम जलप्रपात है। अपनी गिरती विशाल जलराशि के कारण इसे भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। वर्षा ऋतु में इस प्रपात का विस्तार अधिकतम होता है। उस समय इसके पाट की चौड़ाई डेढ़ सौ मीटर तक पहुंच जाती है। हालांकि वर्षा ऋतु में होने वाली दिक्कतों व बाढ़ के कारण उस दौरान बहुत ही कम पर्यटक यहां आते हैं। किंतु जैसे ही वर्षा काल गुजर जाता है तो पानी की मात्रा कम होने से इसका रौद्र रूप घटने लगता है और जल निर्मल होने लगता है। शीत ऋतु आते-आते इसका सौंदर्य परवान चढ़ने लगता है। जगदलपुर से चित्रकोट प्रपात की दूरी 40 किमी है। इस स्थान पर इंद्रावती नदी की जलधारा 100 फीट की ऊंचाई से भारी गर्जना के साथ गिरती है। इस विशाल जलराशि के नीचे गिरने से पैदा होने वाली जल की सूक्ष्म बूंदें आस-पास कुहासा पैदा करती हैं। सूर्योदय व सूर्यास्त के समय इसकी छटा और निराली लगती है क्योंकि  तब इस पर पड़ने वाली सूर्य की रश्मियां इंद्रधनुषी प्रभाव पैदा करती हैं।
पहर के हिसाब से रंग
इस प्रपात का रंग पहर के हिसाब से बदलता रहता है। नीचे गिरते ही नदी का प्रवाह शांत हो जाता है। प्रपात के समीप आप नौकायन का आनंद ले सकते हैं। कई पर्यटक नौका से उस स्थल के करीब तक जाते हैं जहां प्रपात का प्रवाह गिरता है। यह अपने आप में न भूलने वाला क्षण होता है जब डर और विस्मय से आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। स्थानीय मछुआरों को अपनी पारंपरिक डोंगियों में मछली पकड़ते देखा जा सकता है। चित्रकोट के सौंदर्य को यदि आप चारों पहर निहारना चाहते है तो एक दिन कम से कम आपको चाहिए। तब आप इस प्रपात के हर रूप को देख सकते हैं। रुकने के लिए सबसे अच्छा है समीप में विश्रामगृह-जहां से आप इसे अपलक देख सकते हैं। यदि वहां स्थान न हो तो तट पर टेंट कालोनी भी एक विकल्प है। वैसे जगदलपुर से यहां तक आने वाले मार्ग के मध्य अब कुछ रिसोर्ट बन रहे हैं। चलने से पूर्व आप चाहे तो प्रपात के समीप ही आदिवासी शिल्पियों द्वारा बना हस्तशिल्प भी खरीद सकते हैं। चित्रकोट में इस विशाल प्रपात को बनाने के बाद नदी एकदम शांत हो जाती है जहां से आगे इंद्रावती अपनी बड़ी बहन गोदावरी से मिलने को चल देती है। पूर्व में उड़ीसा में कालाहांडी की पहाडि़यों से निकलने वाली इंद्रावती नदी बस्तर व दंतेवाड़ा जिलों का 265 किमी का रास्ता तय करने के बाद पश्चिम में आंध्र व महाराष्ट्र की सीमा पर गोदावरी से मिल जाती है। दंतेवाड़ा में भी उसकी छटा देखने योग्य होती है।
मनोहारी दृश्य
दंतेवाड़ा में राज्य के प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थान बारसूर के निकट माण्डर में यह नदी बोध घाटी से गिरने पर सात धाराओं में विभक्त होकर एक मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करती है जिन्हें सात अलग-अलग नामों बोधधारा कपिलधारा, पांडवधारा, कृष्णधारा, शिवधारा, बाणधारा व शिवचित्रधारा नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र घने वन्य क्षेत्र में होने के कारण यहां की छटा रमणीय है। किंतु यदि आप जगदलपुर से सातधारा जाना चाहते हैं तो अलग से योजना बनानी होती है। इसलिए यहां जाने से पहले तय कर लें कि आपको इस दिन क्या-क्या देखना है? अच्छा हो कि आप उस दिन जगदलपुर-भवानीपट्टनम राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित गीदम से 25 किमी दूर बारसूर नामक स्थान पर में फैले नागगुगीन पुरातात्ति्‍‌वक स्थलों को भी देख लें। बारसूर से 22 किमी. की दूरी पर और दंतेवाड़ा स्थित शक्तिपीठ दंतेश्वरी मंदिर का भी भ्रमण कर सकते हैं जो कि एक अनुपम मंदिर है। यदि इस दिन बुधवार है तो आप यहां लगने वाले साप्ताहिक हाट को भी देख सकते हैं। चाहे तो उस दिन दंतेवाड़ा में भी रुक सकते हैं और अगले दिन बछेली व आकाश नगर जा सकते है। यहीं पर भारत में लौह अयस्क का विशाल खनन क्षेत्र बैलाडिला है।
एक अनूठा उद्यान
200 वर्ग किमी में फैला कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान सुकमा-कोंटा मार्ग पर जगदलपुर से 45 किमी दूर है। यह उद्यान प्रकृति के कई रूपों से परिपूर्ण है। यहां न केवल वन्य जंतुओं को देखा जा सकता है बल्कि इसके अंदर एक मनोरम जलप्रपात तीरथगढ़ व प्राचीन गुफाएं है। वन्य जंतुओं में रुचि लेने वाले चाहे तो इस उद्यान में कई प्रकार के जानवरों को देख सकते हैं। पहाड़ी मैना भी इनमें एक है। इस उद्यान में सागौन के घने जंगल अपने अनछुए रूप में देखे जा सकते हैं। जैव-विविधता से परिपूर्ण यह उद्यान एक नायाब स्थान है। वृक्षों का घनापन इतना कि सूर्य की रश्मियों को भी नीचे पहुंचने के लिए संघर्ष करना होता है।
तीरथगढ़ प्रपात भी दर्शनीय
तीरथगढ़ जलप्रपात जलराशि की दृष्टि से तो बहुत विशाल नहीं है किंतु दर्शनीय है। इस स्थान की भौगोलिक संरचना ऐसी है जहां से कांगेर नदी जब नीचे गिरती है तो गिरती जलराशि एक स्थान की बजाय विशाल चट्टान के ऊपर बिखर जाती है। यहां पर नदी का प्रवाह अलग-अलग खंडों में गिरकर दो-तीन प्रपात बनाता है। गिरने पर पानी की धारा धवल चांदी की तरह चमकती हुई प्रतीत होती है। कई पर्यटक तो यहां पर नहाने का मोह नहीं छोड़ पाते हैं। तीन स्तरों पर प्रपात बनाने के बाद नदी की धारा अठखेलियां करते हुए संकरी घाटी में आगे बढ़ जाती है।
कोटुम्बसर गुफा
उद्यान के भीतर एक और चीज देखने योग्य है वह है यहां की गुफाएं। कोटुमसर (कोटुम्बसर) गुफा भी भूमिगत गुफा है। इस गुफा का प्रवेश मार्ग बेहद संकरा है। लगभग 320 मीटर लंबी व 20 से 60 मीटर की गहराई पर बनी इस गुफा की गिनती विश्व की प्राकृतिक रूप से बनी विशालतम भूमिगत गुफाओं में होती है। इसे बगैर गाइड व उचित प्रकाश व्यवस्था के नहीं देखा जा सकता है। उद्यान के मुख्य द्वार से गाइड मिल जाता है जो आपको इस गुफा का मार्ग दिखलाने व प्रकाश व्यवस्था का कार्य करता है। गुफा के द्वार पर इस बात का कतई भी अहसास नहीं होता है कि यह गुफा इतनी बड़ी होगी।
इसमें प्रवेश के लिए पहले भूमि के अंदर संकरी सीढि़यों से बीस मीटर नीचे उतरना होता है। इसके बाद आप पहुंचते हैं गुफा में ही एक खुले स्थान में। आगे बढ़ने पर आपको चूने की झूलती स्टेलेक्टाइट चट्टानें व स्टेलेग्माइट चट्टानें नजर आती हैं। गौर से देखने पर आपको इनमें कई रूप नजर आने लगते हैं मानो इनको किसी ने गढ़ा हो। गुफाएं लंबी है इसलिए थकावट हो सकती है। गुफा का वातावरण बेहद गर्म होने से जब आप बाहर निकलते हैं तो आपके माथे पर पसीना न आए ऐसा कम ही होता है। थोड़ी दूरी पर दो अन्य गुफाएं दंडक व कैलाश पड़ती हैं। समय हो तो बस्तर व दंतेवाड़ा में कई प्रपात- चित्रधारा, गुप्तेश्वर, मल्गेर, महादेव घूमर, हाथी दरहा, तामड़ा घूमर भी देखें जा सकते हैं।

Sunday, March 4, 2018

तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध सिरपुर


सिरपुर में महानदी का वही स्थान है जो भारत में गंगा नदी का है। महानदी के तट पर स्थिति सिरपुर का अतीत सांस्कृतिक विविधता तथा वास्तुकला के लालित्य से ओत-प्रोत रहा है। सिरपुर प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात रहा है तथा सोमवंशी शासकों के काल में इसे दक्षिण कौसल की राजधानी होने का गौरव हासिल है। कला के शाश्वत नैतिक मूल्यों एवं मौलिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ धार्मिक सौहार्द्र तथा आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से आलोकित सिरपुर भारतीय कला के इतिहास में विशिष्ट कला तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है।अतीत के पन्नों में सिरपुर की गाथा :- सिरपुर का प्राचीन नाम श्रीपुर है, इतिहासकारों के अनुसार सिरपुर पांचवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण कौसल की राजधानी रह चुका है। छठी शताब्दी में चीनी यात्री व्हेनसांग भी यहां आया था। छठी शताब्दी में निर्मित भारत का सबसे पहले ईंटों से बना मंदिर है। यह मंदिर सोमवंशी राजा हर्षगुप्त की विधवा रानी बासटा देवी द्वारा बनवाया गया था। अलंकरण, सौंदर्य, मौलिक अभिप्राय तथा निर्माण कौशल की दृष्टि से यह अपूर्व है। लगभग 07 फुट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर स्थित यह मंदिर रानी बासटा, महाशिव गुप्त बालार्जुन की माता एवं मगध के राजा सूर्यबर्मन की पुत्री थी, यह अत्यंत भव्य है। पंचस्थ प्रकार का यह मंदिर गर्भगृह, अंतराल तथा मंडप से संयुक्त है। मंदिर के बाह्य भित्तियों पर कूट-द्वार बातायन आकृति चैत्य गवाक्ष, भारवाहकगर्ण, गज, कीर्तिमान आदि अभिप्राय दर्शनीय है। मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत सुंदर है। सिरदल पर शेषदायी विष्णु प्रदर्शित है। उभय द्वार शाखाओं पर विष्णु के प्रमुख अवतार विष्णु लीला के दृश्य अलंकारात्मक प्रतीक, मिथुन दृश्य तथा वैष्णव द्वारपालों का अंकन है। गर्भगृह में रागराज अनंत शेष की बैठी हुई सौम्य प्रतिमा स्थापित है। पुरातात्विक नगरी सिरपुर में वैसे तो प्रायः हर तालाब और पाण्डुवंशीय काल में बड़े-बड़े मंदिरों, का निर्माण हुआ। जिनमें त्रिदेव मंदिर भी प्रमुख है। जिसका प्रवेश द्वार कम से कम दस फुट चौड़ा था। इसी दौरान सुरंग टीला पंचायतन मंदिर गंधेश्वर मंदिर के सामने बड़ा शिव मंदिर आदि का निर्माण हुआ। सिरपुर में गंधेश्वर मंदिर महानदी के पावन तट पर है, जहां इसका निर्माण हुआ। सिरपुर गंधेश्वर मंदिर महानदी के पावन तट पर है, जहां पैदल प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु श्रावण मास में बम्महनी (महासमुंद) सेतगंगा से कांवड यात्रा कर 'बोल बम' के जयकारे के साथ पैदल सिरपुर पहुंचकर भगवान गंधेश्वर में जल अर्पित करते हैं। श्रावण मास में सिरपुर भगवा रंग में रंग जाता है। यहां गंधेश्वर मंदिर जिसका संचालन पब्लिक ट्रस्ट करती है इस मंदिर की पूजा-अर्चना गोस्वामी परिवार की तीसरी पीढ़ी कर रही है। राधा-कृष्ण मंदिर एवं विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों के यहां मंदिरों का निर्माण कराया गया है। मंदिर का संचालन एक ट्रस्ट एवं सामाजिक जनों द्वारा किया जाता है।सिरपुर महोत्सव की शुरुआत :छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विशेष पहल पर स्थानीय लोगों की मांग पर वर्ष 2006 से सिरपुर महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव से सिरपुर को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। महोत्सव के आयोजन के बाद से पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन में भी तेजी आई है। स्थलों के उत्खनन से बड़े-बड़े शिव मंदिरों सहित विशेष रूप से यहां पंचायत शैली का मंदिर मिले हैं जो कि पंचायतन शैली में निर्मित भारत का सबसे बड़ा मंदिर है। इसके अलावा बौद्धिक स्तूप और राज प्रसाद भी नए उत्खनन में मिले हैं। आकर्षण का केन्द्र :इस गौरवशाली महोत्सव के भव्य और सफल आयोजन के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति की जाती है। साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी लोकगीतों और लोकनृत्यों की विभिन्न शैलियों को पूरे पंरपरा के साथ मंच में प्रस्तुत किया जाता है। लोकगीत और लोकनृत्य विविध रूपों ददरिया, करमा, देवार नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी जाती है, भक्तगण मेले के दौरान आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों का लुत्फ उठाते हैं।

Monday, February 26, 2018

मंगल की सेवा सुन मेरी देव हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े

मंगल की सेवा सुन मेरी देव हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े
पं सुपारी धवज़ा नारियल ले ज्वाला तेरी भेंट धरे
सुन जगदांबे ना कर बिलंबे संतान के भंडार भरे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे

बुद्धा विधाता तू जग्मता मेरा कारज सिद्धा करे
चरण कमाल की लिया आसरा चरण तुम्हारी आन पड़े
जब जब भीर पड़े भक्टं पर तब तब आए सहाय करे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे

गुरु के बाद सकल जाग मोयो कारुणी रूप अनूप धरे
माता होकर पुत्रा खिलवे कई बार आ भोग करे
शुक्रा सुखदायी सदा सहाइ संत खड़े जैकर करे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे

ब्रम्‍हा विष्णु महेश फल लिए भेंट देने सब द्वार खड़े
अटल सिंहासन बैठी माता फिर सोने का छात्रा फिरे
वार सनीचर कुमकुम वर्नी जब हुक्म करे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे मा जाई काली कल्याण करे

खड़ाग खपर त्रिशूल हाथ लिए रक्तबीज़ को भस्म करे
सुंभ निशूंभ छान ही मे मारे महिससुर को पकड़ डाले
आ दीतवारी आदि भवानी जान अपने का कष्ट हारे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे मा जाई काली कल्याण करे

कुपित होये सब दानव मारे चाँद मूंद सब चूर करे
जब तुम देखो दया रूप हो पल मे संकट डोर करे
सोमया स्वाभाव धरो मेरी माता जान की अर्ज़ कबूल करे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे मा जाई काली कल्याण करे

सात बार की महिमा वर्नी सब गुण कों बखान करे
सिंग पीठ पर छड़ी भवानी अतुल भवन मे राज करे
दर्शन पावे मंगल गेव शिव षधक तेरी भेंट धरे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे मा जाई काली कल्याण करे

ब्रम्‍हा वेद पड़े तेरे द्वारे शिव शंकर हरी ध्यान करे
श्री कृष्णा तेरी करे आरती श्रवण कुबेर दुलार करे
जाई जननी जाई मत भवानी अचल भवन मे राज करे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे
मा जाई काली कल्याण करे मा जाई काली कल्याण करे

मंगल की सेवा सुन मेरी देव हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े
पं सुपारी धवज़ा नारियल ले ज्वाला तेरी भेंट धरे
सुन जगदांबे ना कर बिलंबे संतान के भंडार भरे
संतान प्रतिपली सदा ख़ुसली जाई काली कल्याण करे